बेतवा नदी के किनारे स्तिथ कश्वा एरच में एक ऐसी खबर ने सनसनी फैला रखी है जिसको सोचकर ही कमजोर दिल वालों की रूह कांप जाए ।
हालांकि मामला ही कुछ ऐसा हैं की जिसका दर्द शब्दों में बयान कर पाना वैसा ही लगता है जैसा कि दिल्ली की यमुना नदी को साफ कर पाना ।
इस मामले को साझा करते हुए कश्वावशीयों ने जो हमे जानकारी दी है वही हम आपको साझा करेंगे ।
बात आज शाम लगभग ३ बजे की है ।
कुछ अज्ञात लोग सहपरिवार होली के त्योहार की रस्मों को अंजाम देने के लिए एरच घाट पर पहुंचे ।
वो लोग अपनी मारुति वैन से आए थे ।
लोगों का कहना है उनकी संख्या लगभग 10 के आज पास थी ।
लेकिन यही चिंता का विषय तब बनी जब वेन मारुति वही खड़ी की खड़ी रह गई । लगभग १२ से ज्यादा घंटे बीत चुके है वेन में आए उन लोगों के बारे में किसी को कुछ खबर नहीं है ।
गाड़ी अभी भी उसी जगह अपने मालिक और मालिक के परिवार के वापस आने के इंतजार में बेतवा नदी के किनारे खड़ी हैं।
एक तरफ एरच पुलिस अपनी कोशिश कर रही हैं।
दूसरी तरफ लोग अभी भी सनसनी में है ।
कि उन लोगों के अचानक गायब हो जाने का कारण क्या है ।
कहीं वो लोग गाड़ी को नदी किनारे छोड़ कर चले तो नहीं गए या फिर उनके लापता होने का कारण बेतवा नदी के दिल पर चलाई गई जेसीबी है ।
लोगो का कहना है के यहां गंभीर मामले अक्सर देखे जाते है।
पर ये कुछ नया है । आमतोर पर साल में १ , २ लोग बेतवा नदी के ऊपर बने उस पुल से कूदकर आत्महत्या कर लेते है ।
वही कुछ लोग डूबकर अपनी जान गवां देते हैं।
कश्ववशियो का कहना है की यहां डूबने वाले लोग अकसर बाहरी जगह से आए हुए लोगों के रिश्तेदार या शादी में आए हुए बआरती होते है । जिन्हें बेतवा की सुंदरता अपनी और आकर्षित कर लेती है। और वो नहाने के लिए अकेले नदी में उतर जाते हैं।
नदी में उतरने तक तो सब ठीक था लेकिन। अवैध खनन के दौरान बेतवा नदी में चलाई गई जेसीबी से जो गड्ढे हो गए है
उनसे अनजान परदेशी अचानक उस गड्ढे की लपेट में आने से अपनी जान गवां बैठता है ।
उनकी मौत के कारण का जिम्मेदार आज से कई साल पहले तत्कालीन सरकार द्वारा करवाए गए अवैध खनन को ठहराए या फिर उस अनजान व्यक्ति की मासूमियत को जो अकेले ही उस नदी में नहाने पहुंच गया
वही नदी जिसके दिल में कई साल पहले चली जेसीबी से मौत के कई बवंडर बन गए है ।
हालाकि सासन का काम ही है बदलाव करने का लेकिन जब यही बदलाव अज्ञानता से अपने भले के लिए या फिर विकास की आड़ में किए जाते है । तब प्रकृति पर किए गए जुल्म नासूर बन कर जन्म लेते हैं।
आखिर इसका जिम्मेदार सरकार को नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि ये लोकतंत्र है साहब यहां सरकार बनाते ही हम है
खैर मुद्दे को ज्यादा लंबा न खींचते हुए अपनी बात को बस यही कहकर खत्म करना चाहूंगा
सावधान रहे सतर्क रहे पहली नजर मैं अनजान नदी को देखकर उसने उतरने का मन बनाने से पहले एक बार सोच ले
अगर मन बना ही लिया हो तो फिर वहां के आस पास के लोगों से नदी की थोड़ी बहुत जानकारी ले ले और पूछ ले की नदी में उतरना ठीक है भी या नहीं
याद रहे की नदी में गड्ढों के अलावा मगर और गढ़ियाल भी अपने भोजन के इंतजार में बैठे रहते हैं ।
खास तौर पर अगर आप मां बाप है तो ये बात जरा गंभीरता से ले और अपने बच्चो को नदी और तालाबों से दूर रखे ।
याद रहे की ये हादसे मेरी उम्र के लोगों के साथ ही ज्यादा होते है । या कुछ यूं कह लें इन हादसों को अंजाम हमारी उम्र के लोग ही देते है । मुझे तो वाटरफोबिया है में ये कहकर अक्सर दोस्तों के साथ नदी में उतरने से बच जाता हूं।
चिंता का विषय आपका है ।
सावधान रहे सतर्क रहे ।
कि,
ये जमीन तब भी निगल लेने को आमादा थी
जब पांव टूटती साखों से उतारे हमने ।
इन मकानों को खबर है न मकीनों को
उन दिनों की जो खलाओं में गुजारे हमने
हाथ ढलते गए सांचों में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नए नक्श निखारे हमने
की ये दीवार बुलंद और बुलंद और बुलंद
बामो दर और जरा और संबआरे हमने
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है।
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी
सब उठो में भी उठूं तुम भी उठो तुम भी उठो।
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।

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